Wednesday, 6 September 2017

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श्राद्ध पक्ष में ऐसे होते हैं पितृ प्रसन्न, पढ़ें शास्त्रोक्त तर्पण विधि   TARPAN SHRADH BIDHI IN SANSKRIT




प्रत्येक मनुष्य की इच्छा रहती है कि वह एवं उसका परिवार सुखी एवं संपन्न रहें। मनुष्य को अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए देवता के साथ-साथ अपने पितरों का भी पूजन करना चाहिए।

कैसे करें पितृ पूजन... DOWNLOAD FROM- RESULT123.IN
तर्पण विधि - सर्वप्रथम अपने पास शुद्ध जल, बैठने का आसन (कुशा का हो), बड़ी थाली या ताम्रण (ताम्बे की प्लेट), कच्चा दूध, गुलाब के फूल, फूल-माला, कुशा, सुपारी, जौ, काली तिल, जनेऊ आदि पास में रखे।

आसन पर...
आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करें।

ॐ केशवाय नम:,
ॐ माधवाय नम:,
ॐ गोविन्दाय नम: बोलें।

आचमन के बाद हाथ धोकर अपने ऊपर जल छिड़के अर्थात् पवित्र होवें, फिर गायत्री मंत्र से शिखा बांधकर तिलक लगाकर कुशे की...
अपना नाम एवं गोत्र उच्चारण करें फिर बोले अथ् श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थ देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणम करिष्ये।।

फिर थाली या ताम्र पात्र में जल, कच्चा दूध, गुलाब की पंखुड़ी डाले, फिर हाथ में चावल...
फिर थाली या ताम्र पात्र में जल, कच्चा दूध, गुलाब की पंखुड़ी डाले, फिर हाथ में चावल लेकर देवता एवं ऋषियों का आह्वान करें। स्वयं पूर्व मुख करके बैठें, जनेऊ को रखें। कुशा के अग्रभाग को पूर्व की ओर रखें,...

ॐ आगच्छन्तु में पितर इमम ग्रहन्तु जलान्जलिम

फिर पितृ तीर्थ से अर्थात् अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग से तर्पण दें। 1. अपने गोत्र का उच्चारण करें एवं पिता का नाम लेकर तीन बार उनको तर्पण दें।
2. अपने गोत्र का उच्चारण करें, दादाजी (पितामह) का नाम लेकर तीन बार उनको तर्पण दें।
3. अपने गोत्र का उच्चारण करें पिताजी के...

देव तपर्णम्

देव शक्तियाँ ईश्वर की वे महान् विभूतियाँ हैं, जो मानव-कल्याण में सदा निःस्वार्थ भाव से प्रयतनरत हैं। जल, वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् तथा अवतारी ईश्वर अंगों की मुक्त आत्माएँ एवं विद्या, बुद्धि, शक्ति, प्रतिभा, करुणा, दया, प्रसन्नता, पवित्रता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ सभी देव शक्तियों में आती हैं। यद्यपि ये दिखाई नहीं देतीं, तो भी इनके अनन्त उपकार हैं। यदि इनका लाभ न मिले, तो मनुष्य के लिए जीवित रह सकना भी सम्भव न हो। इनके प्रति कृतज्ञता की भावना व्यक्त करने के लिए यह देव-तर्पण किया जाता है। यजमान दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों में पवित्री धारण करें। ॐ आगच्छन्तु महाभागाः, विश्वेदेवा महाबलाः । ये तपर्णेऽत्र विहिताः, सावधाना भवन्तु ते॥ जल में चावल डालें । कुश-मोटक सीधे ही लें ।। यज्ञोपवीत सव्य (बायें कन्धे पर) सामान्य स्थिति में रखें। तर्पण के समय अंजलि में जल भरकर सभी अँगुलियों के अग्र भाग के सहारे अपिर्त करें। इसे देवतीर्थ मुद्रा कहते हैं। प्रत्येक देवशक्ति के लिए एक-एक अंजलि जल डालें। पूवार्भिमुख होकर देते चलें।
ॐ ब्रह्मादयो देवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्। 
ॐ ब्रह्म तृप्यताम्। 
ॐ विष्णुस्तृप्यताम्।
ॐ रुद्रस्तृप्यताम्। 
ॐ प्रजापतितृप्यताम्।
ॐ देवास्तृप्यताम्। 
ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। 
ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। 
ॐ पुराणाचायार्स्तृप्यन्ताम्। 
ॐ गन्धवार्स्तृप्यन्ताम्।
ॐ इतराचायार्स्तृप्यन्ताम्। 
ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यन्ताम्। 
ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्। 
ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्।
ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ नागास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ पवर्ता स्तृप्यन्ताम्।
ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्। 
ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्।
ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्।
ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्।
ॐ सुपणार्स्तृप्यन्ताम्।
ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। 
ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्।
ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। 
ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्।
ॐ भूतग्रामः चतुविर्धस्तृप्यन्ताम्।

ऋषि तर्पण

दूसरा तर्पण ऋषियों के लिए है। व्यास, वसिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनी, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ऋषि तर्पण द्वारा की जाती है। ऋषियों को भी देवताओं की तरह देवतीर्थ से एक-एक अंजलि जi
ॐ मरीच्यादि दशऋषयः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्। 
ॐ मरीचिस्तृप्याताम्। 
ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। 
ॐ अंगिराः तृप्यताम्। 
ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। 
ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। 
ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। 
ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। 
ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। 
ॐ भृगुस्तृप्यताम्। 
ॐ नारदस्तृप्यताम्।

दिव्य-मनुष्य तर्पण

तीसरा तर्पण दिव्य मानवों के लिए है। जो पूर्ण रूप से समस्त जीवन को लोक कल्याण के लिए अपिर्त नहीं कर सकें, पर अपना, अपने परिजनों का भरण-पोषण करते हुए लोकमंगल के लिए अधिकाधिक त्याग-बलिदान करते रहे, वे दिव्य मानव हैं। राजा हरिश्चंद्र, रन्तिदेव, शिवि, जनक, पाण्डव, शिवाजी, महाराणा प्रताप, भामाशाह, तिलक जैसे महापुरुष इसी श्रेणी में आते हैं। दिव्य मनुष्य तर्पण उत्तराभिमुख किया जाता है। जल में जौ डालें। जनेऊ कण्ठ की माला की तरह रखें। कुश हाथों में आड़े कर लें। कुशों के मध्य भाग से जल दिया जाता है। अंजलि में जल भरकर कनिष्ठा (छोटी उँगली) की जड़ के पास से जल छोड़ें, इसे प्राजापत्य तीर्थ मुद्रा कहते हैं। प्रत्येक सम्बोधन के साथ दो-दो अंजलि जल दें-
ॐ सनकादयः दिव्यमानवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्। 
ॐ सनकस्तृप्याताम्॥2॥
ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्॥2॥ 
ॐ सनातनस्तृप्यताम्॥2॥ 
ॐ कपिलस्तृप्यताम्॥2॥ 
ॐ आसुरिस्तृप्यताम्॥2॥ 
ॐ वोढुस्तृप्यताम्॥2॥ 
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्॥2॥

दिव्य-पितृ-तर्पण

चौथा तर्पण दिव्य पितरों के लिए है। जो कोई लोकसेवा एवं तपश्चर्या तो नहीं कर सके, पर अपना चरित्र हर दृष्टि से आदर्श बनाये रहे, उस पर किसी तरह की आँच न आने दी। अनुकरण, परम्परा एवं प्रतिष्ठा की सम्पत्ति पीछे वालों के लिए छोड़ गये। ऐसे लोग भी मानव मात्र के लिए वन्दनीय हैं, उनका तर्पण भी ऋषि एवं दिव्य मानवों की तरह ही श्रद्धापूवर्क करना चाहिए। इसके लिए दक्षिणाभिमुख हों। वामजानु (बायाँ घुटना मोड़कर बैठें) जनेऊ अपसव्य (दाहिने कन्धे पर सामान्य से उल्टी स्थिति में) रखें। कुशा दुहरे कर लें। जल में तिल डालें। अंजलि में जल लेकर दाहिने हाथ के अँगूठे के सहारे जल गिराएँ। इसे पितृ तीर्थ मुद्रा कहते हैं। प्रत्येक पितृ को तीन-तीन अंजलि जल दें।
ॐ कव्यवाडादयो दिव्यपितरः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्। 
ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वाधा नमः॥3॥ 
ॐ सोमस्तृप्यताम्, इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वाधा नमः॥3॥ 
ॐ यमस्तृप्यताम्, इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वाधा नमः॥3॥ 
ॐ अयर्मा स्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तस्मै स्वाधा नमः॥3॥ 
ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तेभ्यः स्वाधा नमः॥3॥ 
ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तेभ्यः स्वाधा नमः॥3॥ 
ॐ बहिर्षदः पितरस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं (गंगाजलं वा) तेभ्यः स्वाधा नमः॥3॥

यम तर्पण

यम नियन्त्रण-कर्त्ता शक्तियों को कहते हैं। जन्म-मरण की व्यवस्था करने वाली शक्ति को यम कहते हैं। मृत्यु को स्मरण रखें, मरने के समय पश्चात्ताप न करना पड़े, इसका ध्यान रखें और उसी प्रकार की अपनी गतिविधियाँ निधार्रित करें, तो समझना चाहिए कि यम को प्रसन्न करने वाला तर्पण किया जा रहा है। राज्य शासन को भी यम कहते हैं। अपने शासन को परिपुष्ट एवं स्वस्थ बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को, जो कत्तर्व्य पालन करता है, उसका स्मरण भी यम तर्पण द्वारा किया जाता है। अपने इन्द्रिय निग्रहकर्त्ता एवं कुमार्ग पर चलने से रोकने वाले विवेक को यम कहते हैं। इसे भी निरंतर पुष्ट करते चलना हर भावनाशील व्यक्ति का कत्तर्व्य है। इन कत्तर्व्यों की स्मृति यम-तर्पण द्वारा की जाती है। दिव्य पितृ तर्पण की तरह पितृतीथर् से तीन-तीन अंजलि जल यमों को भी दिया जाता है।
ॐ यमादिचतुदर्शदेवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्। 
ॐ यमाय नमः॥3॥ 
ॐ धमर्राजाय नमः॥3॥ 
ॐ मृत्यवे नमः॥3॥ 
ॐ अन्तकाय नमः॥3॥ 
ॐ वैवस्वताय ॐ कालाय नमः॥3॥ 
ॐ सवर्भूतक्षयाय नमः॥3॥ 
ॐ औदुम्बराय नमः॥3॥ 
ॐ दध्नाय नमः॥3॥ 
ॐ नीलाय नमः॥3॥ 
ॐ परमेष्ठिने नमः॥3॥ 
ॐ वृकोदराय नमः॥3॥ 
ॐ चित्राय नमः॥3॥ 
ॐ चित्रगुपताय नमः॥3॥

तत्पश्चात् निम्न मन्त्रों से यम देवता को नमस्कार करें-

ॐ यमाय धमर्राजाय, मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय, सवर्भूतक्षयाय च॥
औदुम्बराय दध्नाय, नीलाय परमेष्ठिने।
वृकोदराय चित्राय, चित्रगुप्ताय वै नमः॥

मनुष्य-पितृ-तर्पण

इसके बाद अपने परिवार से सम्बन्धित दिवंगत नर-नारियों का क्रम आता है।
  1. पिता, बाबा, परबाबा, माता, दादी, परदादी।
  2. नाना, परनाना, बूढ़े नाना, नानी परनानी, बूढ़ीनानी।
  3. पतनी, पुत्र, पुत्री, चाचा, ताऊ, मामा, भाई, बुआ, मौसी, बहिन, सास, ससुर, गुरु, गुरुपतनी, शिष्य, मित्र आदि।

यह तीन वंशावलियाँ तर्पण के लिए है। पहले स्वगोत्र तर्पण किया जाता है-

गोत्रोत्पन्नाः अस्मत् पितरः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्। 
अस्मत्पिता (पिता) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्पितामह (दादा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्प्रपितामहः (परदादा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मन्माता (माता) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा गायत्रीरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा सावित्रीरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्प्रत्पितामही (परदादी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा लक्ष्मीरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्सापतनमाता (सौतेली माँ) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥

अन्य तर्पण

द्वितीय गोत्र तर्पण

इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करें। यहाँ यह भी पहले की भाँति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढ़कर तिल सहित जल की तीन-तीन अंजलियाँ पितृतीर्थ से दें तथा-
अस्मन्मातामहः (नाना) अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्प्रमातामहः (परनाना) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद्वृद्धप्रमातामहः (बूढ़े परनाना) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो आदित्यरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मन्मातामही (नानी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा लक्ष्मीरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्प्रमातामही (परनानी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा रुद्ररूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद्वृद्धप्रमातामही (बूढ़ी परनानी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा आदित्यारूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥

इतर तर्पण

जिनको आवश्यक है, केवल उन्हीं के लिए तर्पण कराया जाए-
अस्मत्पतनी अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्सुतः (बेटा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्कन्याः (बेटी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्पितृव्यः (चाचा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मन्मातुलः (मामा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद्भ्राता (अपना भाई) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्सापतनभ्राता (सौतेला भाई) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्पितृभगिनी (बुआ) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मान्मातृभगिनी (मौसी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मदात्मभगिनी (अपनी बहिन) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्सापतनभगिनी (सौतेली बहिन) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद श्वशुरः (श्वसुर) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद श्वशुरपतनी (सास) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद्गुरु अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद् आचायर्पतनी अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत् शिष्यः अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मत्सखा अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद् आप्तपुरुषः (सम्मानीय पुरुष) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥ 
अस्मद् पतिः अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3॥
निम्न मन्त्र से पूवर् विधि से प्राणिमात्र की तुष्टि के लिए जल धार छोड़ें-
ॐ देवासुरास्तथा यक्षा, नागा गन्धवर्राक्षसाः। पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः, कूष्माण्डास्तरवः खगाः॥ 
जलेचरा भूनिलया, वाय्वाधाराश्च जन्तवः। प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु, मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः॥ 
नरकेषु समस्तेषु, यातनासुु च ये स्थिताः। तेषामाप्यायनायैतद्, दीयते सलिलं मया॥ 
ये बान्धवाऽबान्धवा वा, येऽ न्यजन्मनि बान्धवाः। ते सवेर् तृप्तिमायान्तु, ये चास्मत्तोयकांक्षिणः। आब्रह्मस्तम्बपयर्न्तं, देवषिर्पितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सवेर्, मातृमातामहादयः॥ 
अतीतकुलकोटीनां, सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मभुवनाल्लोकाद्, इदमस्तु तिलोदकम्। ये बान्धवाऽबान्धवा वा, येऽ न्यजन्मनि बान्धवाः। ते सवेर् तृप्तिमायान्तु, मया दत्तेन वारिणा॥

वस्त्र-निष्पीडन

शुद्ध वस्त्र जल में डुबोएँ और बाहर लाकर मन्त्र को पढ़ते हुए अपसव्य भाव से अपने बायें भाग में भूमि पर उस वस्त्र को निचोड़ें।
ॐ ये के चास्मत्कुले जाता, अपुत्रा गोत्रिणो मृताः। 
ते गृह्णन्तु मया दत्तं, वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥

भीष्म तर्पण

अन्त में भीष्म तर्पण किया जाता है। ऐसे परमार्थ परायण महामानव, जिन्होंने उच्च उद्देश्यों के लिए अपना वंश चलाने का मोह नहीं किया, भीष्म उनके प्रतिनिधि माने गये हैं, ऐसी सभी श्रेष्ठात्माओं को जलदान दें-
ॐ वैयाघ्रपदगोत्राय, सांकृतिप्रवराय च। 
गंगापुत्राय भीष्माय, प्रदास्येऽहं तिलोदकम्॥ 
अपुत्राय ददाम्येतत्, सलिलं भीष्मवमर्णे॥

  

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